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भोपाल। भोपाल में आरटीओ के पीछे सरकारी जमीन पर एक्सपायर्ड दवाएं जलाने की घटना ने शहर में बायोमेडिकल वेस्ट के निपटारे की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस मामले में जिम्मेदार महकमों की जवाबदेही तय करते हुए बायोमेडिकल कचरे को लेकर सख्त व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए हैं। कचरा पैदा होने से लेकर उसके उपचार तक की पूरी प्रक्रिया 48 घंटे के भीतर पूरी करनी होगी। कचरा ढोने वाले वाहनों में जीपीएस लगाना होगा और उसकी रियल टाइम निगरानी की सुविधा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को देनी होगी।
एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच में नगर निगम की ओर बताया गया कि जांच के बाद नगर निगम ने मौके से कचरा उठाकर अधिकृत कामन बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (सीबीडब्ल्यूटीएफ) को सौंपा है। वहां 5.2 किलो एक्सपायर्ड दवाओं को इंसीनरेट कर नष्ट किया गया, लेकिन कार्रवाई का सबसे अहम हिस्सा अभी अधूरा है। जांच एजेंसियां यह पता नहीं लगा सकीं कि यह कचरा किस अस्पताल, क्लीनिक या मेडिकल संस्थान से वहां पहुंचा। एनजीटी के समक्ष पेश रिपोर्ट में भी जिम्मेदार स्रोत की पहचान नहीं हो पाने की बात दर्ज है, जिस पर अधिकरण ने निगम को फटकार लगाई।
अस्पतालों की अब होगी जवाबदेही
ट्रिब्यूनल ने मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया है कि हर बेडेड और नान-बेडेड हेल्थकेयर संस्थान के पास वैध अनुमति और सीबीडब्ल्यूटीएफ की सदस्यता सुनिश्चित की जाए। नियमों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई करनी होगी। नगर निगम को घरों और अस्पतालों से निकलने वाले बायोमेडिकल कचरे के लिए बिना शुल्क कलेक्शन और निस्तारण की व्यवस्था विकसित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। गार्बेज ट्रांसफर स्टेशनों पर भी कलेक्शन सुविधा विकसित करनी होगी।
कचरा वाहन लीकेज प्रूफ केबिन जरूरी
नगर निगम के कचरा वाहनों में मेडिकल वेस्ट के लिए लीकेज-प्रूफ अलग केबिन व्यवस्था और बायोहैजर्ड चिह्न अनिवार्य होंगे। दोपहिया से कचरा संग्रहण की अनुमति केवल संकरी गलियों वाले क्लीनिकों के लिए होगी और उसमें भी निर्धारित कलेक्शन बाक्स, ढक्कन, स्पिल प्रबंधन, फर्स्ट एड और मैनिफेस्ट रिकार्ड रखना होगा।
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