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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकरSupreme Court of India में चल रही सुनवाई ने धर्म और संविधान के रिश्ते पर गहरी बहस छेड़ दी है। याचिकाकर्ता के वकीलRakesh Dwivedi ने दलील दी कि धर्म संविधान से पहले से अस्तित्व में है और यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने धार्मिक संप्रदायों को विशेष अधिकार दिए। उन्होंने भारतीय सभ्यता की निरंतरता का श्रेय हिंदू धर्म, भक्ति आंदोलनों और आचार्यों को देते हुए धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा पर जोर दिया।
इस मामले में कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि यदि राज्य सामाजिक सुधार या जनहित के नाम पर किसी धार्मिक प्रथा में हस्तक्षेप करता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही ज्यूडिशियल रिव्यू की सीमाएं हों, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि कोर्ट के पास हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। 9 जजों की संवैधानिक पीठ इस मुद्दे के साथ-साथ धार्मिक आस्था से जुड़े 66 अन्य मामलों पर भी विचार कर रही है।
गौरतलब है किKerala High Court ने 1991 में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई थी, जिसेSupreme Court of India ने 2018 में हटा दिया। इस फैसले के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर अब सुनवाई जारी है। मंदिर प्रशासन और कुछ पक्ष इस परंपरा को बनाए रखने के पक्ष में हैं, जबकि अन्य इसे समानता और अधिकारों के नजरिए से चुनौती दे रहे हैं।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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