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एमपी हाईकोर्ट समेत देशभर में जजों की भारी कमी, न्याय व्यवस्था पर बढ़ता दबाव
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देश की न्यायपालिका में जजों की कमी एक गंभीर समस्या बन गई है। संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, देश के 25 हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुल 1122 स्वीकृत न्यायाधीश पदों में से 308 पद खाली हैं, यानी लगभग 27.4 प्रतिशत पद रिक्त हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में 53 स्वीकृत पदों में से 42 ही भरे हुए हैं, जबकि जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में कुल 1639 न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और आम नागरिकों को न्याय मिलने में वर्षों का इंतजार करना पड़ सकता है।

 

विशेषज्ञों और वकीलों का कहना है कि निचली अदालतों में जजों की कमी न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और आम जनता के भरोसे पर असर डाल रही है। मध्य प्रदेश के अधीनस्थ न्यायालयों में SC, ST और OBC वर्ग के जज कुल संख्या का आधे से भी कम हैं, जबकि अन्य वर्ग के अधिकारी आधिकारिक संख्या का 51 प्रतिशत हैं। हाईकोर्ट और जिला अदालतों में रिक्त पदों के कारण न्याय में देरी और संवेदनशील मामलों में फैसलों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

 

देशभर में हालात और भी चिंताजनक हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में 31.25 प्रतिशत, कलकत्ता में 40.3 प्रतिशत और जम्मू-कश्मीर एवं झारखंड हाईकोर्ट में 44 प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पदों की संख्या बढ़ाई नहीं जाती और सामाजिक विविधता के साथ न्यायिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं होता, तब तक न्यायपालिका का आम नागरिक तक पहुँच और न्याय देने की क्षमता कमजोर रहेगी।

Priyanshi Chaturvedi 31 January 2026

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